कानून मजबूत है अब क्या उसका पालन भी उतना ही मजबूत है?…..

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(पब्लिक भारत डेस्क )

सोनभद्र। ओबरा और बिल्लि-मारकुंडी की पत्थर खनन बेल्ट फिर सुर्खियों में है। वजह वही सुरक्षा बनाम उत्पादन। और इस बार सवाल सीधे-सीधे नियमों के पालन पर हैं। सूत्रों की माने तो हाल ही में डीजीएमएस ने माइंस एक्ट, 1952 की धारा 22(3) के तहत निरीक्षण के बाद सख्त आदेश जारी किया था। आदेश में साफ कहा गया कि सामान्य खनन गतिविधियाँ तत्काल प्रभाव से रोकी जाती हैं। केवल “Rectification Work” यानी सीमित, सशर्त सुधार कार्य की अनुमति होगी। शर्तें बेहद स्पष्ट थीं।  खदान के तल (Bottom) में कोई कार्य नहीं। 06 दिसंबर 2025 के सर्वे प्लान में PINK रंग से चिह्नित क्षेत्र में ही सीमित सुधार कार्य। 90 दिन में सुरक्षा सुधार पूरा कर रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य। उल्लंघन पर अनुमति निरस्त। कागज पर आदेश लोहे की तरह मजबूत है। कानून भी साफ है। लेकिन जमीन पर क्या तस्वीर है?। स्थानीय ग्रामीणों और कुछ श्रमिकों का दावा है कि प्रतिबंधित खदानों में फिर मशीनें गरज रही हैं। भारी ब्लास्टिंग की गूंज सुनाई दे रही है। यदि यह गतिविधि “सुधार” की परिभाषा से बाहर है, तो यह सीधा उल्लंघन हो सकता है।

यहां स्पष्ट कर देना जरूरी है…..

सोनभद्र। सरकार की नीति पर सवाल नहीं। प्रदेश सरकार लगातार सुरक्षित खनन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कर रही है। लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर आदेश की अवहेलना हो रही है, तो यह प्रशासनिक क्रियान्वयन पर प्रश्न है। सुधार कार्य का मतलब उत्पादन शुरू करना नहीं होता। सुधार का अर्थ है ढलानों को स्थिर करना, सुरक्षित बेंचिंग बनाना, हाई-वॉल को मजबूत करना, जल निकासी दुरुस्त करना। यदि सुधार की आड़ में उत्पादन शुरू हो गया, तो यह कानून की भावना के साथ खिलवाड़ होगा। यह मामला इसलिए और गंभीर है क्योंकि कुछ समय पहले इसी क्षेत्र में दर्दनाक हादसा हुआ था। विस्फोट के बाद खदान धंस गई थी। करीब आधा दर्जन मजदूरों की मौत हुई थी। कई परिवार आज भी उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं। उस समय सख्ती, मुकदमे, जांच सबकी घोषणा हुई थी। खनन गतिविधियाँ रोकी गई थीं। अब अगर वही क्षेत्र फिर से भारी गतिविधियों के लिए चर्चा में है, तो सवाल उठेंगे ही।

स्थिर ढलानों के ब्लास्टिंग बेहद खतरनाक

सोनभद्र। खनन विशेषज्ञ बताते हैं कि पत्थर खदानों में बिना उचित बेंचिंग और स्थिर ढलानों के ब्लास्टिंग बेहद खतरनाक होती है। यदि हाई-साइड अस्थिर हो, तो मामूली कंपन भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। डीजीएमएस का आदेश इसी जोखिम को कम करने के लिए था। तो फिर स्थिति क्या है? जिला प्रशासन और खनन विभाग को अब पारदर्शी तरीके से जवाब देना चाहिए क्या 90 दिन में वास्तविक सुधार कार्य पूरा हुआ? क्या संयुक्त निरीक्षण हुआ? क्या रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? क्या ड्रोन सर्वे कराया गया? क्या स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट हुआ? क्या मजदूरों को सुरक्षा उपकरण और प्रशिक्षण दिया गया? ये सवाल किसी आरोप के लिए नहीं, बल्कि भरोसा कायम करने के लिए हैं।

विकास की रफ्तार मजदूरों की सुरक्षा से बड़ी नहीं

सोनभद्र। जिले का खनन उद्योग प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजस्व आता है, रोजगार मिलता है, विकास होता है। लेकिन विकास की रफ्तार मजदूरों की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती। मजदूर खदान में इसलिए उतरते हैं क्योंकि उन्हें काम चाहिए। वे जोखिम समझते हैं, लेकिन लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर नहीं चुकानी चाहिए। यदि प्रतिबंधित क्षेत्र में सामान्य खनन हो रहा है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं यह नैतिक जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ना है। सरकार की छवि तभी मजबूत होगी जब जमीनी स्तर पर आदेश का अक्षरशः पालन दिखे। खनन संचालकों की विश्वसनीयता तभी बचेगी जब वे पारदर्शिता अपनाएँ।

हर धमाका अब एक सवाल बनकर गूंज रहा है….

सोनभद्र। अब समय है खुली कार्रवाई का? निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक हो। सुधार कार्य की फोटो और वीडियो प्रमाण जारी हों। ड्रोन फुटेज साझा की जाए। तकनीकी ऑडिट रिपोर्ट सामने आए। यदि सब कुछ नियमों के तहत है, तो पारदर्शिता से किसी को डर नहीं होना चाहिए। और यदि कहीं गड़बड़ी है, तो उसे तुरंत रोका जाना चाहिए। हर धमाका अब एक सवाल बनकर गूंज रहा है क्या सुधार सच में हो रहा है? या इतिहास खुद को दोहराने की ओर बढ़ रहा है? सोनभद्र की धरती विकास की गाथा लिखे यह सब चाहते हैं। लेकिन वह गाथा मजदूरों की कुर्बानी पर नहीं लिखी जानी चाहिए। खनन चले पर नियमों के भीतर। ब्लास्टिंग हो पर सुरक्षा मानकों के साथ। उत्पादन हो पर जीवन की कीमत पर नहीं। सरकार की मंशा साफ है सुरक्षा पहले। अब प्रशासन और खनन संचालकों को इसे जमीन पर साबित करना होगा। क्योंकि अंततः सवाल पत्थर का नहीं, इंसान का है। सवाल मुनाफे का नहीं, जिंदगी का है। और सोनभद्र यह देख रहा है कानून मजबूत है अब क्या उसका पालन भी उतना ही मजबूत है?

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