बघाड़ू जमीन प्रकरण पर हाईकोर्ट का फैसला

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HIGHLIGHTS
  • सोनभद्र के बघाड़ू गांव में आदिवासियों की जमीन से जुड़े चर्चित
  • प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है।
  • जिला प्रशासन ने रविवार को जिन जमीनों के बैनामे निरस्त
  • कर उन्हें ग्राम सभा में निहित
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सोनभद्र के बघाड़ू गांव में आदिवासियों की जमीन से जुड़े चर्चित प्रकरण में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। जिला प्रशासन ने रविवार को जिन जमीनों के बैनामे निरस्त कर उन्हें ग्राम सभा में निहित किया था, हाईकोर्ट ने उस कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। प्रशासन के मुताबिक, कार्रवाई के बाद अब इन जमीनों पर जन उपयोगी निर्माण की तैयारी की जा रही है। खेल मैदान, बारात घर और बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित करने की योजना है। दुद्धी तहसील के बघाड़ू गांव में आदिवासी भूमि से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद जिला प्रशासन ने अपनी कार्रवाई को कानून सम्मत बताया है। जिला प्रशासन के मुताबिक, रजिया उर्फ नन्हकी नाम की महिला के मुस्लिम व्यक्ति बहादुर अली से निकाह और धर्म परिवर्तन के बाद आदिवासी भूमि की खरीद-फरोख्त का मामला सामने आया था। प्रशासन का आरोप है कि दस्तावेजों में उसकी पुरानी पहचान का इस्तेमाल कर अनुसूचित जनजाति की जमीनों के बैनामे कराए गए। प्रशासन के अनुसार, जांच के बाद 40 गाटों में दर्ज करीब 5.7142 हेक्टेयर भूमि को ग्राम सभा में निहित किया गया। जिला प्रशासन का यह भी कहना है कि संबंधित जमीनों के बैनामों को कानून के तहत शून्य घोषित किया गया था। इस कार्रवाई के खिलाफ रजिया ने हाईकोर्ट का रुख किया था। अब अदालत ने जिला प्रशासन की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। फैसले के बाद प्रशासन ने जमीनों को जन उपयोग में लाने की तैयारी शुरू कर दी है। अधिकारियों के मुताबिक, यहां बच्चों के लिए खेल मैदान, लोगों की सुविधा के लिए बारात घर और समाज सुधारक बिरसा मुंडा की प्रतिमा स्थापित करने की योजना है। शेष भूमि पर शासकीय भवनों के निर्माण की बात कही गई है। जिलाधिकारी चर्चित गौड़ के मुताबिक, प्रशासन ने मामले में प्रभावी पैरवी की और न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष मजबूती से रखा।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह सवाल भी आया कि लंबे समय तक दूसरे धर्म और रीति-रिवाजों के अनुसार जीवन यापन करने के बावजूद क्या संबंधित व्यक्ति अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले विधिक संरक्षण का दावा कर सकता है। अदालत के समक्ष याची की ओर से अपनी जनजातीय परंपराओं से निरंतर जुड़ाव का पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका। बघाड़ू का यह मामला अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद एक नए मोड़ पर है। प्रशासन का कहना है कि जमीन को निजी विवाद से निकालकर जन उपयोग में लाने की दिशा में आगे की कार्रवाई की जा रही है।

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