पब्लिक डेस्क
दिवाली के त्योहार के दौरान उल्लू की अवैध बिक्री एक गंभीर समस्या है, जो वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है। इस कुप्रथा को रोकने के लिए वन विभाग की टीमें सतर्क हैं, लेकिन फिर भी चोरी-छिपे उल्लू की बिक्री हो रही है। उल्लू की अवैध बिक्री के कारण मुख्य कारण अंधविश्वास कुछ लोग उल्लू की बलि चढ़ाने से धन प्राप्ति का अंधविश्वास रखते हैं। ज्ञान की कमी लोगों में उल्लू के महत्व और संरक्षण के बारे में जागरूकता की कमी है। सूत्रों की माने तो दीपों की चमक, पटाखों की गूंज और मिठाइयों की मिठास के बीच दिवाली का त्योहार आते ही एक पुरानी कुप्रथा फिर से सिर उठा लेती है। हलचल भरे बाजारों में चोरी-छिपे उल्लू की अवैध बिक्री शुरू हो चुकी है। धन-प्राप्ति के अंधविश्वास में लोग इस रात उल्लू की बलि चढ़ाने को तैयार रहते हैं, बिना ये सोचे कि ये न सिर्फ कानूनन अपराध है, बल्कि एक निर्दोष प्राणी की क्रूर हत्या भी। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत सख्ती से प्रतिबंधित इस व्यापार पर नजर रखने के लिए वन विभाग की टीमें दिन-रात सतर्क हैं। लेकिन, फिर भी चोरी छिपे उल्लू की बिक्री हो रही है। हालांकि वन विभाग ने उल्लू की अवैध बिक्री पर रोक लगाने के लिए पेट्रोलिंग बढ़ा दी है। वन विभाग की टीमें चोरी-छिपे उल्लू की बिक्री पर नजर रख रही हैं।
सूबे की राजधानी में सजता है पक्षियों का बाजार
उप्र की राजधानी के चौक, नक्खास और नींबू पार्क जैसे पशु-पक्षी बाजारों में दिवाली के दौरान उल्लू और अन्य प्रतिबंधित पक्षियों की अवैध बिक्री बढ़ जाती है। इन पक्षियों की कीमतें भी आसमान छूने लगती हैं। तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास को लेकर कुछ लोग इन पक्षियों की बलि चढ़ाते हैं। इसके साथ ही कुछ लोग धन की कामना के लिए इन पक्षियों की बलि चढ़ाने को तैयार रहते हैं। उल्लू एक प्रतिबंधित पशु है दीपावली के समय में उल्लू की कीमत 20 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक पहुंच जाती है। इसके साथ ही तोता, मुनिया, तीतर और बटेर इन पक्षियों की भी कीमतें आसमान छूने लगती हैं।
वन विभाग में भी माना होता है यह कार्य
वन विभाग के डीएफओ ने कहा की दिवाली के दौरान प्रतिबंधित प्रजातियों के अवैध शिकार और व्यापार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। वन विभाग ने रेंज के सभी वन कर्मियों को स्थानीय सूचना तंत्र मजबूत करने, सघन गश्त और रात्रि निगरानी के निर्देश दिए हैं। वन विभाग की टीमें बाजारों में औचक छापेमारी करेंगी। वन कर्मियों को स्थानीय सूचना तंत्र मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ बताया कि वन कर्मी सघन गश्त और रात्रि निगरानी करेंगे। अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि रोकथाम आसान नहीं। लोगों को अंधविश्वास के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है। वन विभाग जिला प्रशासन और पुलिस के साथ मिलकर काम कर रहा है। वन विभाग ईको क्लब और एनजीओ के साथ मिलकर उल्लू की बिक्री पर नकेल कसने की मुहिम चला रहा है।
पक्षियों के शिकार पर है 6 माह की सजा
वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत उल्लू जैसे पक्षियों का शिकार, बिक्री या बलि देना गंभीर अपराध है। पकड़े जाने पर न्यूनतम 6 महीने की कैद और भारी जुर्माना हो सकता है। बावजूद इसके, हर साल दिवाली पर ये कुप्रथा दोहराई जाती है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत उल्लू जैसे पक्षियों का शिकार, बिक्री या बलि देना अपराध है। पकड़े जाने पर न्यूनतम 6 महीने की कैद और भारी जुर्माना हो सकता है। आपको बता दें कि ग्रामीण इलाकों में तांत्रिकों का प्रभाव अभी भी मजबूत है। धन- लाभ के चक्कर में लोग इन निर्दोष पक्षियों की जान ले लेते हैं। लोगों को वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक करना चाहिए। तांत्रिकों को भी जागरूक करना चाहिए और उन्हें इस कुप्रथा में शामिल न होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
विनाश की ओर धकेल रहीं यह परंपरा
पर्यावरणविदों का मानना है कि उल्लू न सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। फिर भी, बलि की परंपरा इसे विनाश की ओर धकेल रही है। उल्लू चूहों जैसे कीटों को नियंत्रित करता है, जिससे फसलों की सुरक्षा होती है। उल्लू को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, जो धन और समृद्धि की देवी हैं। इसकी बलि की परंपरा उल्लू को विनाश की ओर धकेल रही है। शिक्षा और जागरूकता अभियान चलाकर ही इस कुप्रथा को जड़ से उखाड़ा जा सकता है।
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