
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ निवासी एक दिव्यांग आशू के जज्बे को सलाम, पैरों से लाचार दिव्यांग ई रिक्शा चलाकर कर रहा है अपना और अपने बुजुर्ग मां बाप का भरण पोषण कर रहे है। आपको बता दे कि सराय कुतुब बाबरी मंडी अलीगढ़ निवासी आशू दिव्यांग है, परिवार की ज़िम्मेदारी का बोझ उठाने के लिए उसने किराए पर ई रिक्शा लेकर ई रिक्शा चलाने का काम शुरू किया। गौरतलब है कि इंसान के अंदर कुछ करने का जुनून और जज़्बा हो तो कामयाबी की बुलंदियों को ज़रूर छूता है। कामयाबी के रास्ते में अगर कुछ रुकावट आती है तो वह आपकी नकारात्मक सोच। वहीं आपके अंदर अगर निगेटिव सोच को पॉज़िटिव सोच में तब्दील करने की कुव्वत है, तो आप कामयाबी की ईबारत ज़रूर लिखेंगे।क्योंकि आज हम आपको अलीगढ़ जिले के एक ऐसे ही दिव्यांग युवक से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जो कि दिव्यांग होते हुए भी, दिव्यांगता की आड़ में लोगों से कभी मदद नहीं मांगी, बल्कि खुद ही आत्मनिर्भर बना और आज वह स्मार्ट सिटी के लोगों के लिए एक मिसाल है।

तो वहीं आशू को अपने इस जज्बे के सामने कई बार उसको दिव्यांग होने के चलते पुलिस की जिल्लत झेलते हुए कई बार परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है, बावजूद उसके दिव्यांग के इस जज्बे को देखकर आप भी कहेंगे “सलाम आशू भाई” बता दें कि ऊपरकोट कोतवाली क्षेत्र के सराय कुतुब बाबरी मंडी निवासी 20 वर्षीय युवक आंसू दिव्यांग है, परिवार की ज़िम्मेदारी का बोझ उठाने के लिए उसने 400 रुपये रोज पर किराए पर ई रिक्शा लेकर सवारियां ढोते हुए ई रिक्शा चलाने का काम शुरू कर दिया। इससे उनके परिवार की ज़िम्मेदारियां तो पूरी हो ही रही है, इसके साथ ही आशू खुद भी खुशहाल ज़िंदगी बसर कर रहे हैं, वहीं आपको बता दें कि दिव्यांग पिछले एक साल से ई-रिक्शा किराए पर लेकर सवारियां ढोने का काम कर रहा हैं। वहीं आपको बता दें ई-रिक्शा में पैरों से ब्रेक लगाए जाते हैं। बावजूद इसके आशु पैरों से विकलांग होने के चलते ई रिक्शा में हाथ से ब्रेक लगाने की व्यवस्था करके ई-रिक्शा का चला रहा है। मीडिया से मुखातिब होते हुए आशू पुत्र चंद्रपाल ने अपनी दर्द भरी दास्तां बया करते हुए बताया कि दिव्यांग होने की वजह से अपनी ज़िंदगी से निराश हो चुके थे, लेकिन दूसरे दिव्यांगों की तरह उसने भीख नहीं मांगी। परिवार में बुजुर्ग मां-बाप के साथ खुद का पालन पोषण की ज़िम्मेदारियां को पूरा करने की भी उसके ऊपर चुनौती थी। इन सब चीज़ों ओर जिम्मेदारियां का बोझ उठाने के लिए उसने किराए पर ई रिक्शा लेकर ई रिक्शा चलाकर सवारियां ढोने का काम शुरू किया। पिछले एक साल से ई रिक्शा की मदद से वह विभिन्न क्षेत्रों में घूम-घूम कर सवारियां ढो रहा हैं। आशू की चलती फिरती ई रिक्शा से वह शहरी क्षेत्र में जा कर सवारियां ढो रहा हैं। जिससे उसको थोड़ा बहुत मुनाफा हो रहा है। आशू ने कहा कि स्वरोज़गार से मुनाफा भी हो रहा है और इज़्ज़त से कमा भी रहे हैं। वही आंसू ने बताया कि वह रोजाना 500 से करीब 600 रुपये ई-रिक्शा में सवारियां ढोकर कमा लेता है इसमें से जो कमाई होती है,उसमें 400 रुपये ई रिक्शा के किराए के चले जाते हैं, और बाकी बचे पैसो से वह अपना और अपने बुजुर्ग मां-बाप का पालन पोषण करते हुए गुजर बसर रहा है। दिव्यांग आशू ने कहा कि प्रदेश और केंद्र सरकार की तरफ से मदद तो नहीं मिली, लेकिन बावजूद इसके जब वह किराए का ई रिक्शा लेकर अपने परिवार की जिम्मेदारियां का निर्वहन कर रहा है, तो ऐसे में उसको कई बार विकलांग होने पर ई रिक्शा चलाते हुए देख पुलिस की फटकार के सामने परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है, और उससे पुलिस कर्मियों के द्वारा कहा जाता है कि वह विकलांग है,ओर विकलांग लोगों को गाड़ी चलाने की सरकार की तरफ से अनुमति नहीं है। इस पर उसके द्वारा फटकार लगाने वाले उन पुलिस कर्मियों से कहा जाता है कि अगर वह ई-रिक्शा नहीं चलाएगा तो फिर अपने बुजुर्ग मां-बाप सहित खुद का पेट कैसे भरेगा। यही उसकी असल मजबूरी है कि दिव्यांग होने के चलते उसको किराए पर ई रिक्शा चला कर अपने बुजुर्ग मां-बाप सहित खुद के परिवार का पालन पोषण करना पड़ रहा है।
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