डाला/सोनभद्र(अरविंद दुबे, गिरीश तिवारी)
कभी डाला नगर की जीवनरेखा रही कौआ पथरहवा नाले आज मिट्टी, मलबे और उदासीनता के बोझ तले दबते जा रहे हैं। इन नालों की कल-कल बहती धारा अब एक मूक विलाप में बदल चुकी है। आसपास के खनन क्षेत्रों से लाकर योजनाबद्ध ढंग से इनमें मिट्टी डंप की जा रही है, जिससे इनका वृहद स्वरूप धीरे-धीरे मिटता जा रहा है,यह केवल एक जलधारा की बात नहीं है यह नगर की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक स्मृति और पर्यावरणीय संतुलन पर मंडराता संकट है।आज, जब पूरी दुनिया विश्व धरोहर दिवस मना रही है और अपनी विरासतों के संरक्षण का संकल्प दोहरा रही है, डाला की यह जीवित धरोहर मर्यादा की अंतिम सांसें ले रही है।

स्थानीय नागरिक रामराज कोल बताते हैं कि बीते महीनों से नाले के विभिन्न हिस्सों में लगातार मिट्टी और मलबा डाला जा रहा है। यह कार्य न केवल जल प्रवाह को बाधित कर रहा है, बल्कि नाले को धीरे-धीरे भूमि में बदल देने की प्रक्रिया बन चुका है। और यह सब कुछ नगर के एक प्रमुख धार्मिक स्थल के ठीक सामने घटित हो रहा है। दृश्य स्पष्ट है जहां कभी जल की गहराई और चौड़ाई नज़र आती थी, आज वहां झाड़ियां, मलबा और सूखी चुप्पी पसरी है जल स्तर घटाया नहीं गया, दबा दिया गया है। कुछ स्थानों पर तो नाले की पहचान ही मिटा दी गई है,अगर यही स्थिति बनी रही तो आगामी वर्षा ऋतु में यही मिट्टी पूरे नगर में जलजमाव, गंदगी और महामारी जैसी स्थितियों को जन्म देगी। नाले के किनारे बसे मोहल्लों के लिए यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकट में बदल सकता है।स्थानीय लोग धरोहर को बचाने की गुहार लगा रहे हैं। उनकी मांग है कि प्रशासन तत्काल हस्तक्षेप करे नाले की सफाई कर इसके पुराने स्वरूप को बहाल करे, और जो लोग इस विनाश के लिए ज़िम्मेदार हैं, उन पर कड़ी कार्रवाई हो।

वहीं नगर के वरिष्ठ समाजसेवी महेश सोनी का कहना है कि डाला की यह जलधाराएं केवल पानी की रेखाएं नहीं, बल्कि सभ्यता, स्मृति और सतत विकास की नींव हैं। इन्हें बचाना, भविष्य को बचाना है।
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