डाला गोलीकांड की 34वीं बरसी, शहीदों को श्रद्धांजलि में थमा नगर, गूंजे नारों से कांपा राजमार्ग

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डाला/सोनभद्र(अरविंद दुबे,गिरीश तिवारी)-
2 जून 1991 को उत्तर प्रदेश सीमेंट निगम के निजीकरण के विरोध में आंदोलनरत कर्मचारियों पर हुई बर्बर पुलिस फायरिंग की 34वीं बरसी पर सोमवार को डाला की सड़कों पर आक्रोश और श्रद्धा का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला। शहीदों की स्मृति में नगरवासियों ने वाराणसी-शक्तिनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को दोपहर 3:20 बजे सांकेतिक रूप से रोक दिया। जैसे ही घड़ी की सुइयां गोलीकांड के समय को छूती हैं, पूरा नगर दो मिनट के मौन में थम जाता है। “डाला तेरा यह बलिदान, याद रखेगा हिंदुस्तान” के गगनभेदी नारों से फिजाएं गूंज उठीं।डाला की धरती पर 1991 में हुए इस गोलीकांड में एक छात्र राकेश उर्फ जय प्रकाश त्रिपाठी सहित आठ सीमेंट कर्मी – रामप्यारे कुशवाहा, शैलेन्द्र कुमार राय, सुरेन्द्र द्विवेदी, बाल गोविंद, रामधारी, रामनरेश राम, नन्द कुमार गुप्ता और दीनानाथ – शहीद हो गए थे। सैकड़ों लोग घायल हुए थे। यह घटना न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति बल्कि केंद्र सरकार को भी झकझोर देने वाली बनी थी। सीमेंट कर्मचारियों के हक के लिए लड़े गए इस संघर्ष ने डाला को पूरे देश में एक प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया।

पुण्यतिथि पर नगर में सुबह 10 बजे से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा प्रारंभ हुई। शहीद स्मारक स्थल पर हरि कीर्तन और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया गया। संध्या को सुंदरकांड पाठ और भजन-कीर्तन के बीच श्रद्धा की गूंज सुनाई दी। शहीद परिवारों की महिलाओं ने वीर चक्र चढ़ाकर पुष्पांजलि अर्पित की।


श्रद्धांजलि सभा में भाजपा जिलाध्यक्ष नंदलाल गुप्ता, पूर्व जिलाध्यक्ष धर्मवीर तिवारी, भाजपा नेता मुकेश जैन, संतोष कुमार बबलू, धीरेन्द्र प्रताप सिंह, ओम प्रकाश तिवारी, राजू मिश्रा, बृजेश कुमार तिवारी, देवनाथ चंद्रवंशी, इंदू शर्मा, राजेश द्विवेदी, संदीप सिंह पटेल, संतोष त्रिपाठी, फूलवंती कुमारी, अविनाश शुक्ला, पारस यादव और मंगला जायसवाल समेत बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और आमजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन समाजसेवी नरेन्द्र नीरव ने किया।
पूरे आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे। लेकिन जनता की एकजुटता और अनुशासन ने यह साबित कर दिया कि डाला गोलीकांड अब एक भावनात्मक आंदोलन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की स्थायी विरासत बन चुका है।आज भी डाला गोलीकांड की वह चिंगारी बुझी नहीं, बल्कि जन अधिकारों और श्रमिक अस्मिता की मशाल बनकर जल रही है। 34 वर्षों बाद भी शहीदों की कुर्बानी सोनभद्र की आत्मा में गूंजती है और आने वाली पीढ़ियों को संघर्ष, एकता और अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देती है।

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