सेवा, समर्पण और विवादों के बीच ईमानदारी की पहचान
रिपोर्ट (A.D.)
सोनभद्र। खनिज संपदा से भरे सोनभद्र जनपद में पिछले लंबे समय से अपनी सेवाएँ दे रहे खनन अधिकारी शैलेन्द्र कुमार सिंह का स्थानांतरण झांसी कर दिया गया है। सरकार ने उन्हें झांसी की नई जिम्मेदारी सौंपते हुए उनके कामकाज पर भरोसा जताया है। उनकी जगह अब सोनभद्र में जेष्ठ खनन अधिकारी कमल कश्यप कार्यभार संभालेंगे। शैलेन्द्र सिंह का सोनभद्र कार्यकाल आसान नहीं था। खनन को लेकर यह जिला हमेशा चर्चा में रहा है — कभी अवैध खनन के कारण, तो कभी राजस्व वृद्धि के मुद्दे पर। ऐसे माहौल में वर्षों तक सेवा देना अपने आप में बड़ी बात है। शैलेन्द्र सिंह ने न केवल सरकार के राजस्व में इजाफा कराया बल्कि कानूनी खनन पट्टों को बढ़ावा देने का काम भी किया। उनकी कार्यशैली का मकसद सिर्फ एक रहा — “जो खनन हो, वो नियमों के दायरे में हो।” उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जिनका असर धीरे-धीरे दिखने लगा है। खनन विभाग के जानकार बताते हैं कि आने वाले महीनों में सोनभद्र फिर से प्रदेश के सर्वाधिक राजस्व देने वाले जिलों में शामिल हो सकता है।
क्योंकि शैलेन्द्र सिंह ने आधार तैयार कर दिया है — बाकी काम समय पूरा करेगा।

राजस्व और रोजगार — दो मोर्चों पर सुधार सोनभद्र में खनन न केवल सरकार की आय का बड़ा जरिया है, बल्कि यहाँ के हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी इससे जुड़ी है। शैलेन्द्र सिंह ने अपने कार्यकाल में इन दोनों पहलुओं पर संतुलन बनाने की कोशिश की।उन्होंने वैध खनन पट्टों की संख्या बढ़ाई ताकि खदानों में कामकाज कानूनी दायरे में हो और मजदूरों को रोजगार का स्थायित्व मिले। जानकारों का मानना है कि जब लीगल पट्टों में बढ़ोतरी होगी तो खनन उद्योग का दायरा भी बढ़ेगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों में इजाफा होगा। सरकारी आंकड़ों में भी राजस्व की गति में सुधार दर्ज हुआ है। यानी एक ओर खजाना भरा, तो दूसरी ओर हाथों को काम मिला — यही नीति शासन की प्राथमिकता भी रही।
आरोपों के बीच भी अडिग रहे शैलेन्द्र
किसी भी सख्त अधिकारी के कार्यकाल में विवाद होना आम बात है। शैलेन्द्र सिंह के साथ भी यही हुआ। उन पर कुछ लोगों ने अवैध खनन को बढ़ावा देने के आरोप लगाए, लेकिन उन्होंने इन सभी आरोपों को साफ़ शब्दों में निराधार और बेबुनियाद बताया।

शैलेन्द्र सिंह का कहना है —
“हमने कभी नियमों से बाहर जाकर काम नहीं किया।
जो लोग अवैध तरीके से खनन करना चाहते थे, उनके खिलाफ सख्ती से कार्रवाई की।
वही लोग आज आरोप लगाने वालों की कतार में हैं।
सरकार की नीतियों का पालन करना ही हमारा धर्म है और रहेगा।
उनके इस बयान से यह साफ़ झलकता है कि उन्होंने दबाव से परे रहकर काम किया। दरअसल, सोनभद्र जैसा जिला जहां खनिजों की भरमार है, वहाँ दबाव और हितों का टकराव स्वाभाविक है, लेकिन शैलेन्द्र सिंह ने नियमों के दायरे में रहते हुए काम किया यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।

सरकार का भरोसा ही सबसे बड़ा जवाब
शैलेन्द्र सिंह पर आरोप लगाने वालों के लिए सबसे बड़ा जवाब उनकी नई पोस्टिंग है। योगी सरकार ने उन्हें झांसी जैसा जिला सौंपा है — जो खुद खनिज संपदा के मामले में महत्वपूर्ण माना जाता है।
यानी सरकार ने उनकी कार्यशैली, ईमानदारी और नीतिगत कामकाज पर भरोसा जताया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि ईमानदारी और अनुशासन के लिए जानी जाती है। ऐसे में अगर किसी अफसर को झांसी जैसा अहम जिला दिया जाता है, तो इसका सीधा मतलब है कि सरकार ने उनके काम को सही दिशा में देखा है। यानी आरोप भले लगे हों, लेकिन शासन ने सच्चाई की पड़ताल करके निर्णय लिया।
नए अधिकारी के लिए चुनौती
अब सोनभद्र की कमान जेष्ठ खनन अधिकारी कमल कश्यप के हाथ में है। जिले की उम्मीदें और चुनौतियाँ दोनों ही बड़ी हैं। कमल कश्यप के सामने मुख्य चुनौती होगी — खनन को पारदर्शी बनाते हुए राजस्व और रोजगार के लक्ष्यों को पूरा करना। साथ ही यह देखना कि शैलेन्द्र सिंह द्वारा शुरू किए गए वैध पट्टों के विस्तार की नीति धरातल पर बनी रहे। अगर नई टीम उसी दिशा में आगे बढ़ी, तो आने वाले दिनों में सोनभद्र न केवल प्रदेश बल्कि देश के उन जिलों में शामिल हो सकता है जहाँ खनन, पारदर्शिता और विकास तीनों साथ चलते हैं।

संपादकीय टिप्पणी
सोनभद्र में शैलेन्द्र सिंह का कार्यकाल यह सिखाता है कि ईमानदार नीयत और सख्त फैसले हमेशा आसान नहीं होते, लेकिन अंत में पहचान बनाते हैं। आरोप लग सकते हैं, आलोचना हो सकती है, मगर परिणाम बोलते हैं। उनकी झांसी तैनाती इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने काम देखकर विश्वास जताया है, बातों से नहीं। अब देखना यह होगा कि सोनभद्र में नई व्यवस्था किस दिशा में जाती है , क्या कमल कश्यप उसी रफ्तार और निष्ठा के साथ आगे बढ़ेंगे, या सिस्टम की पुरानी रफ्तार उन्हें भी धीमा कर देगी। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि शैलेन्द्र सिंह ने अपनी ईमानदार छवि और कामकाज से यह साबित किया है कि नीतियों पर टिके रहना ही सबसे बड़ी नीति है।
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