पोस्टमार्टम हाउस की बदहाल व्यवस्था, डॉक्टरों की मनमानी से मृतकों के परिजन परेशान

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दुद्धी/सोनभद्र(रवि सिंह)-तहसील क्षेत्र स्थित पोस्टमार्टम हाउस की स्थिति इन दिनों बद से बदतर बनी हुई है। यहां पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों की ड्यूटी का समय तय होने के बावजूद उसका पालन नहीं होने से शव विच्छेदन हेतु मृतकों के परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई साफ दिखाई दे रही है।ताजा मामला बीती रात म्योरपुर में हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें एक युवक की मौत और दूसरा युवक गंभीर रूप से घायल हो गया था मृतक युवक के शव का पीएम करने हेतु पोस्टमार्टम हाउस के बाहर सुबह से ही बैठे हुए थे लेकिन संबंधित डॉक्टर दोपहर ढाई बजे तक नहीं पहुंचे।

इस दौरान पोस्टमार्टम हाउस के मुख्य द्वार पर ताला लटका रहा, जिससे परिजनों में आक्रोश फैल गया। गुस्साए परिजनों ने डॉक्टरों और पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करते है।
मामले की सूचना मिलने पर उपजिलाधिकारी निखिल यादव मौके पर पहुंचे और संबंधित कर्मचारियों को जमकर फटकार लगाई। साथ ही जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी सोनभद्र को पूरे प्रकरण की जानकारी दी गई। परिजनों ने लापरवाह डॉक्टर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ, तो ऐसे हालात बार-बार दोहराए जाएंगे। पोस्टमार्टम जैसे संवेदनशील कार्य में देरी न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि मानवता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

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स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. शाह आलम अंसारी एवं जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी सोनभद्र से वार्ता के दौरान बताया गया कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों की पूरे एक माह की ड्यूटी सूची पहले से संबंधित व्हाट्सएप ग्रुप में साझा कर दी जाती है। इसके अनुसार डॉक्टरों को यह स्पष्ट जानकारी रहती है कि किस दिन उनकी ड्यूटी है और उनका अनिवार्य समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक निर्धारित है। बावजूद इसके, वास्तविकता यह है कि अधिकतर डॉक्टर दोपहर दो बजे के बाद ही पोस्टमार्टम हाउस पहुंचते हैं और शाम पांच बजते ही बिना कार्य पूर्ण किए अपने गंतव्य को रवाना हो जाते हैं।
इस लापरवाही को लेकर पूर्व में समाजवादी पार्टी के सांसद छोटेलाल खरवार भी नाराजगी जता चुके हैं। उन्होंने डॉक्टरों को अपनी कार्यशैली में सुधार लाकर आमजन को सहूलियत देने की नसीहत दी थी, लेकिन इसका कोई असर दिखाई नहीं दिया। डॉक्टरों की इस उदासीनता का खामियाजा सीधे तौर पर शोक संतप्त परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।

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