सोनभद्र में भारत का ‘टाइम मशीन’ यहां छुपा 160 करोड़ साल पुराना सच

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सोनभद्र। (AKD।गिरीश तिवारी)

सोनभद्र की धरती अपने भीतर ऐसा इतिहास समेटे हुए है, जो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को चौंकाता है। कैमूर पहाड़ियों के बीच स्थित आज एक साधारण पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत का जीवंत प्रमाण बन चुका है। दावा किया जाता है कि यह दुनिया के सबसे प्राचीन जीवाश्म स्थलों में शामिल है और इसकी उम्र करीब 160 करोड़ वर्ष मानी जाती है।

रॉबर्ट्सगंज से लगभग 15 से 17 किलोमीटर दूर वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर फैला यह पार्क करीब 24 से 25 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत है। वर्ष 1933 में द्वारा इसकी खोज की गई थी, जिसने वैज्ञानिक जगत को हैरान कर दिया। वर्ष 2002 में 40 से अधिक देशों के वैज्ञानिकों ने यहां आकर अध्ययन किया और पुष्टि की कि कभी यह क्षेत्र समुद्र के नीचे था, जहां जीवन की शुरुआत काई (एल्गी) के रूप में हुई थी।यहां पाए जाने वाले जीवाश्म साधारण पत्थर नहीं, बल्कि साइनोबैक्टीरिया के रूप में पृथ्वी पर जीवन के शुरुआती प्रमाण हैं। गोल छल्ले जैसी संरचनाएं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘पत्थर के फूल’ या ‘पत्थर के पेड़’ कहते हैं, दरअसल स्ट्रोमैटोलाइट्स हैं, जो उस समय के हैं जब पृथ्वी पर ऑक्सीजन का विकास भी पूरी तरह नहीं हुआ था।

यही वजह है कि यह स्थल वैश्विक स्तर पर एक अमूल्य भू-वैज्ञानिक धरोहर माना जाता है।इस ऐतिहासिक धरोहर को पर्यटन के नक्शे पर मजबूत पहचान दिलाने के लिए प्रशासन सक्रिय है। करीब 2 करोड़ रुपये की लागत से यहां मूलभूत सुविधाओं—कैंटीन, शौचालय, पेयजल, साफ-सफाई और म्यूजियम—का विकास किया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि यदि इसे व्यवस्थित रूप से विकसित किया गया तो यह क्षेत्र न केवल पर्यटन का बड़ा केंद्र बनेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा।प्रशासन के अनुसार, सलखन जीवाश्म पार्क को की वर्ल्ड हेरिटेज सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

योजना है कि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से लैस कर ग्लोबल टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में विकसित किया जाए, ताकि दुनिया भर के पर्यटक यहां आकर पृथ्वी के प्रारंभिक इतिहास को करीब से समझ सकें।हालांकि जमीनी हकीकत अभी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। यहां आने वाले पर्यटकों का कहना है कि स्वच्छता तो बेहतर है, लेकिन शुद्ध पेयजल, ठहरने की व्यवस्था, खानपान और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी अब भी महसूस होती है।

उनका मानना है कि यदि इन कमियों को दूर कर दिया जाए तो यह स्थल विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र बन सकता है।एक ओर जहां सरकार और प्रशासन इस अनमोल धरोहर को वैश्विक पहचान दिलाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर सुधार की जरूरत साफ दिखाई देती है। आने वाला समय तय करेगा कि 160 करोड़ साल पुराना यह इतिहास विश्व मंच पर अपनी पहचान बना पाएगा या फिर पत्थरों में छिपा यह सच यूं ही अनदेखा रह जाएगा।

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