अगोरी किला: रहस्यों, तिलिस्म और खजाने से घिरा इतिहास का जीवंत साक्षी

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रिपोर्ट: पब्लिक डेस्क
सोनभद्र। सोन नदी के तट पर बसे गोठानी गांव में स्थित अगोरी किला सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि रहस्यों, तिलिस्म और इतिहास की अनकही कहानियों का जीवंत साक्षी है। इस किले के बारे में कहा जाता है कि यहां आज भी अदृश्य शक्तियां विद्यमान हैं, जो सदियों पुराने बेशकीमती खजाने की रक्षा करती हैं। किले की दीवारों में दफन है वो इतिहास, जो जितना आकर्षक है, उतना ही रहस्यमय भी। शाम ढलते ही आसपास के लोग दावा करते हैं कि यहां अब भी आत्माओं की चीखें सुनाई देती हैं मानो युद्ध में मारे गए योद्धाओं की रूहें आज भी मुक्ति की तलाश में भटक रही हों।

तीन नदियों से घिरा है दुर्ग
अगोरी किला सोनभद्र जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर SH-5 रोड पर स्थित है। सोन, रेणु और विजुल तीन नदियों से घिरा यह किला प्राकृतिक सुरक्षा का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसे कभी चंदेल और खरवार वंश का आवासीय महल कहा जाता था। यहां के आखिरी शासक एक आदिवासी राजा थे, जिसके कारण इसे आदिवासी किला भी कहा जाता है।

खरवार वंश ने बनाया था किला
इतिहास के पन्नों में झांके तो पता चलता है कि सोनभद्र में खरवार वंश के राजा बालंदशाह ने 12वीं शताब्दी में अपना राज्य स्थापित किया था। उनका शासन घोरावल से लेकर पलामू, सिंगरौली, सीधी, रीवा और अंबिकापुर तक फैला हुआ था। बालंदशाह के वंशज राजा मदनशाह तक यह वंश चला। इसी काल में चौहानों और चंदेलों के बीच वेत्रवती नदी के तट पर भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें चंदेल राजा बारीमल और पारीमल पराजित होकर मदनशाह के दरबार में शरण लेने पहुंचे। मदनशाह ने उन्हें शरण दी और अपने पशुधन व हाथियों की देखभाल का दायित्व सौंप दिया। लेकिन धीरे-धीरे बारीमल और पारीमल ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली और राजमहल में विश्वासपात्र बन गए। इसी दौरान मदनशाह बीमार पड़े और अपने पुत्र को संदेश भेजने का जिम्मा इन्हीं दो मंत्रियों को सौंपा, पर उन्होंने दगा कर दी। राजा की मृत्यु के बाद उन्होंने राज खजाने की चाबियां अपने पास रखीं और स्वयं को राजा घोषित कर दिया।

जाने कैसे मिला चंदेलो को अधिकार
मदनशाह का पुत्र रामा जब लौटकर आया तो उसने अगोरी को पुनः जीतने का प्रयास किया, लेकिन परिमल और बारिमल ने साजिश रच उसे मार डाला। वर्ष 1290 ईस्वी में चंदेलों ने पुनः हमला किया, पर इतिहास ने फिर करवट ली। अगोरी की एक रानी ने अपने नवजात बच्चे को सुरक्षित बचाकर शाहाबाद पहुंचाया। वह बच्चा बड़ा होकर उदानदेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1310 ईस्वी में उदानदेव ने कन्नित (वर्तमान मिर्जापुर) के राजा की मदद से अगोरी पर चढ़ाई की और किले को पुनः जीत लिया। इसके बाद बालंदशाह के वंशज रीवा के मड़वास चले गए, जहां वे स्वतंत्रता तक शासन करते रहे।
आज भी क़ायम है तिलस्म
अगोरी किला सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि लोककथाओं, धर्म और रहस्यमयी घटनाओं का संगम है। माना जाता है कि वीर लोरिक ने भी इसी किले पर राजा मोलगत से युद्ध किया था और उसे परास्त किया था। आज भी यहां आने वाले लोगों को अजीब-सी अनुभूति होती है। जैसे इतिहास की परछाइयां अब भी यहां जीवित हों। अगोरी का तिलिस्म आज भी कायम है, और शायद यही वजह है कि यह किला सोनभद्र की पहचान बनने के साथ-साथ रहस्यमय कहानियों का प्रतीक भी बन चुका है।

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