
रवि सिंह।गिरीश तिवारी
विंढमगंज/सोनभद्र। जनपद के विंढमगंज क्षेत्र स्थित बैरखड़ गांव में आदिवासी समाज ने सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए नियत तिथि से पांच दिन पहले ही होलिका दहन कर होली का पर्व मना लिया। झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे इस गांव में हर वर्ष इसी तरह परंपरा के अनुसार होली मनाई जाती है।ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल के अनुसार अन्य स्थानों के मुकाबले यहां पहले होली मनाने की परंपरा काफी पुरानी है और आज भी समाज इसे पूरी आस्था के साथ निभा रहा है।ग्रामीण बताते हैं कि पूर्वजों के समय होली के दौरान धन-जन हानि और महामारी जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी।

इसके बाद गांव के बुजुर्गों और बैगा ने विचार कर निर्णय लिया कि नियत तिथि से चार-पांच दिन पहले होली मनाई जाए। तभी से यह परंपरा शुरू हुई और आज तक जारी है।पूर्व प्रधान अमर सिंह गौड़, मनरूप गहंवां, छोटेलाल सिंह, रामकिशुन सिंह और लाल मोहन गोंड ने बताया कि होलिका दहन की रस्म बैगा या बिरादरी द्वारा मनोनीत व्यक्ति “संवत डाड़” स्थल पर कराता है। अगले दिन अवशेष उड़ाने की परंपरा निभाई जाती है, फिर पूरे दिन रंग खेलकर इष्ट देव की पूजा-अर्चना की जाती है और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।बैरखड़ की यह अनोखी परंपरा आज भी गांव की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है।
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