
AKD।गिरीश तिवारी
सोनभद्र । स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयासों के बीच स्वशासी राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्थिति गंभीर होती जा रही है। सरकार जहां हर जनपद में मेडिकल कॉलेज खोलकर बेहतर इलाज की दिशा में काम कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर व्यवस्थाएं लड़खड़ाती नजर आ रही हैं। मेडिकल कॉलेज में 96 स्वीकृत जूनियर रेजिडेंट डॉक्टरों के सापेक्ष महज 32 डॉक्टर ही वर्तमान में कार्यरत हैं, जबकि करीब 50 जूनियर डॉक्टर लंबे समय से बिना सूचना के अनुपस्थित बताए जा रहे हैं।

इस भारी कमी का सीधा असर मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है।मेडिकल कॉलेज इस समय दोहरी समस्या से जूझ रहा है। एक तरफ डॉक्टरों की कमी है, तो दूसरी तरफ कार्यरत डॉक्टरों पर अत्यधिक काम का दबाव बढ़ गया है। नियमों के अनुसार एमबीबीएस के बाद सरकार के साथ हुए बांड के तहत जूनियर डॉक्टरों को तीन वर्षों तक सरकारी संस्थानों में सेवा देना अनिवार्य होता है, लेकिन यहां बड़ी संख्या में डॉक्टर इस व्यवस्था का पालन करते नजर नहीं आ रहे हैं। अनुपस्थित डॉक्टरों को प्रशासन की ओर से नोटिस जारी किया गया, इसके बावजूद कई डॉक्टरों ने अब तक अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई, जिससे स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है।डॉक्टरों की इस कमी का असर सबसे ज्यादा इमरजेंसी सेवाओं पर देखने को मिल रहा है, जहां मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है। कई मामलों में मरीजों और उनके परिजनों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कॉलेज परिसर में कई अनुपस्थित डॉक्टरों के हॉस्टल के कमरे बंद पड़े हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे बिना सूचना के लंबे समय से गैरहाजिर हैं। अब कॉलेज प्रबंधन ऐसे कमरों को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में है।

दूसरी ओर, कुछ जूनियर डॉक्टर वेतन भुगतान में देरी को लेकर नाराजगी भी जता चुके हैं और इस संबंध में प्रशासन से शिकायत कर चुके हैं। एक तरफ सरकारी नियम और बांड की बाध्यता है, तो दूसरी तरफ डॉक्टरों की अपनी समस्याएं हैं, लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा परेशानी आम मरीजों को झेलनी पड़ रही है। सोनभद्र जैसे जनपद में, जहां पहले से ही स्वास्थ्य सेवाएं चुनौती बनी हुई हैं, वहां डॉक्टरों की यह कमी और अनुपस्थिति व्यवस्था को और कमजोर कर रही है।स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के दावे तभी सार्थक होंगे जब जमीनी स्तर पर जिम्मेदारी तय होगी और सख्त कदम उठाए जाएंगे। वर्तमान हालात यह साफ संकेत दे रहे हैं कि बिना ठोस कार्रवाई के न तो व्यवस्था सुधरेगी और न ही मरीजों को समय पर बेहतर इलाज मिल पाएगा।
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